आज यानी 25 फरवरी 2026 को देश के श्रम जगत में एक बड़ी हलचल देखने को मिल रही है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से वैचारिक रूप से जुड़ा देश का सबसे बड़ा मजदूर संगठन, भारतीय मजदूर संघ (BMS), सड़कों पर उतरा है। यह विरोध प्रदर्शन किसी एक शहर तक सीमित नहीं है, बल्कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक जिला मुख्यालयों पर मजदूर अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं। अक्सर देखा जाता है कि सत्ता पक्ष के करीबी संगठन सरकार की नीतियों का समर्थन करते हैं, लेकिन जब BMS जैसा संगठन विरोध में खड़ा होता है, तो शासन और प्रशासन के लिए यह गंभीर चिंता का विषय बन जाता है। इस आर्टिकल में हम गहराई से समझेंगे कि इस आंदोलन के पीछे की असली वजह क्या है और मजदूरों की सरकार से क्या-क्या मांगें हैं।
विरोध प्रदर्शन का मुख्य एजेंडा: लेबर कोड्स पर टकराव
इस पूरे आंदोलन की जड़ में केंद्र सरकार द्वारा लाए गए चार नए लेबर कोड्स (Labour Codes) हैं। सरकार का तर्क है कि 44 पुराने और जटिल कानूनों को हटाकर इन 4 कोड्स को लाने से ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ बढ़ेगा और निवेश आएगा। लेकिन BMS का कहना है कि इन बदलावों में मजदूरों के हितों की अनदेखी की गई है। संगठन का आरोप है कि नए कानूनों में कंपनियों को कर्मचारियों को निकालने (Hire and Fire) की जो छूट दी गई है, उससे रोजगार की सुरक्षा खत्म हो जाएगी। मजदूर संघ चाहता है कि सरकार इन कोड्स को लागू करने से पहले दोबारा टेबल पर बैठकर चर्चा करे और ‘मजदूर विरोधी’ प्रावधानों को हटाए।
निजीकरण और विनिवेश (Privatization) पर सख्त ऐतराज
BMS के इस 25 फरवरी के प्रदर्शन का एक बड़ा हिस्सा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs) को बचाने को लेकर है। सरकार द्वारा रेलवे, बैंकिंग, बीमा और रक्षा जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में विनिवेश (Disinvestment) की प्रक्रिया तेज कर दी गई है। भारतीय मजदूर संघ का साफ तौर पर मानना है कि सरकारी संपत्तियों को निजी हाथों में बेचना न केवल कर्मचारियों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है, बल्कि यह देश की आर्थिक संप्रभुता के लिए भी ठीक नहीं है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि लाभ कमाने वाले सरकारी संस्थानों को बेचना बंद किया जाना चाहिए और घाटे वाले संस्थानों को सुधारने के लिए मजदूरों के साथ मिलकर योजना बनानी चाहिए।
न्यूनतम मजदूरी और ‘समान काम, समान वेतन’ की मांग
आज के इस राष्ट्रव्यापी आंदोलन में एक सबसे अहम मुद्दा ‘न्यूनतम मजदूरी’ (Minimum Wage) का है। भारत में अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों में मजदूरी की दरें अलग-अलग हैं। BMS की मांग है कि पूरे देश में एक ‘यूनिवर्सल मिनिमम वेज’ लागू हो, जो आज की बढ़ती महंगाई के हिसाब से तय की जाए। इसके अलावा, सरकारी और निजी क्षेत्र में चल रही ‘ठेका प्रथा’ (Contract System) पर भी बड़ा हमला बोला गया है। संगठन की मांग है कि जो कर्मचारी स्थायी प्रकृति का काम कर रहे हैं, उन्हें ठेके पर न रखकर पक्का किया जाए और ‘समान काम के लिए समान वेतन’ के सिद्धांत को सख्ती से लागू किया जाए।
EPS-95 पेंशन योजना में सुधार की गुहार
रिटायर्ड कर्मचारियों और वर्तमान में काम कर रहे मजदूरों के लिए पेंशन एक बड़ा भावनात्मक और आर्थिक मुद्दा है। ईपीएस-95 (Employees’ Pension Scheme) के तहत मिलने वाली न्यूनतम पेंशन वर्तमान में बहुत कम है, जिससे बुजुर्गों का गुजारा करना मुश्किल हो रहा है। BMS ने अपनी मांगों में स्पष्ट रूप से कहा है कि न्यूनतम पेंशन को बढ़ाकर कम से कम ₹5,000 प्रति माह किया जाए और इसे महंगाई भत्ते (DA) से जोड़ा जाए। यह मांग देश के करोड़ों प्राइवेट सेक्टर के कर्मचारियों से जुड़ी है, जो अपनी पूरी जिंदगी मेहनत करने के बाद एक सम्मानजनक रिटायरमेंट की उम्मीद रखते हैं।
आंगनवाड़ी, आशा और मिड-डे मील वर्कर्स की स्थिति
भारत की स्वास्थ्य और पोषण व्यवस्था की रीढ़ मानी जाने वाली आंगनवाड़ी और आशा कार्यकर्ताओं का मुद्दा भी इस प्रदर्शन में प्रमुखता से उठा है। ये महिला कर्मचारी पिछले कई वर्षों से खुद को ‘स्वयंसेवक’ के बजाय ‘सरकारी कर्मचारी’ का दर्जा देने की मांग कर रही हैं। BMS का कहना है कि इन्हें नाममात्र का मानदेय (Honorarium) देने के बजाय एक सम्मानजनक वेतन दिया जाना चाहिए और इन्हें सामाजिक सुरक्षा जैसे ईपीएफ (EPF) और ईएसआई (ESI) के दायरे में लाया जाना चाहिए। आज के प्रदर्शन में महिला श्रमिकों की भारी भागीदारी इसी असंतोष का परिणाम है।
भारतीय श्रम सम्मेलन (ILC) को बहाल करने की जरूरत
प्रशासनिक दृष्टिकोण से देखें तो BMS की एक बहुत पुरानी मांग है कि ‘भारतीय श्रम सम्मेलन’ (Indian Labour Conference) को जल्द से जल्द बुलाया जाए। यह एक ऐसा मंच होता है जहाँ सरकार, उद्योगपति और मजदूर संगठन एक साथ बैठकर श्रम नीतियों पर चर्चा करते हैं। पिछले कुछ सालों से इस सम्मेलन का आयोजन नहीं हुआ है, जिसे मजदूर संगठन लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं मानते। उनका कहना है कि बिना चर्चा के बंद कमरों में बनाई गई नीतियां जमीन पर सफल नहीं हो सकतीं। इस प्रदर्शन के जरिए सरकार को यह संदेश देने की कोशिश की गई है कि संवाद का रास्ता दोबारा खोला जाए।
फैक्ट चेक: क्या यह आंदोलन राजनीति से प्रेरित है?
अक्सर बड़े आंदोलनों को राजनीतिक चश्मे से देखा जाता है, लेकिन यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि भारतीय मजदूर संघ (BMS) खुद को गैर-राजनीतिक संगठन कहता है। हालांकि इसकी वैचारिक जड़ें RSS में हैं, लेकिन इतिहास गवाह है कि श्रम मुद्दों पर इसने हमेशा अपनी ही विचारधारा वाली सरकारों के खिलाफ भी कड़ा रुख अपनाया है। फैक्ट यह है कि 2026 में हो रहा यह प्रदर्शन केवल किसी एक दल के विरोध में नहीं, बल्कि उन ‘आर्थिक नीतियों’ के विरोध में है जो मजदूरों के बजाय केवल बड़े कॉरपोरेट्स को फायदा पहुँचाती दिख रही हैं।
गवर्नेंस पर क्या होगा असर?
25 फरवरी 2026 का यह प्रदर्शन सरकार के लिए एक वेक-अप कॉल की तरह है। यदि सरकार इन मांगों पर गौर नहीं करती है, तो औद्योगिक अशांति (Industrial Unrest) बढ़ने का खतरा रहता है, जिसका सीधा असर देश की जीडीपी और विकास दर पर पड़ता है। प्रशासन के लिए चुनौती यह है कि वह निवेशकों को लुभाने के लिए कानूनों को सरल भी बनाए रखे और साथ ही मजदूरों के अधिकारों की रक्षा भी करे। आने वाले दिनों में केंद्रीय श्रम मंत्रालय और मजदूर संगठनों के बीच उच्च स्तरीय बैठकों का दौर शुरू हो सकता है, जिससे किसी बीच के रास्ते (Middle Path) की तलाश की जाएगी।
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